Wednesday , 20 June 2018
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सोशल मीडिया को किसी नशे की तरह प्रयोग कर रहे हैं बच्चे

की तुलना में निगेटिव अनुभव ज्यादा प्रभाव डालते हैं इन निगेटिव अनुभवों से युवाओं में अवसाद वाले लक्षणों की आसार बन जाती है शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि सोशल मीडिया के निगेटिव अनुभव अवसाद वाले लक्षणों से जुड़े हैं   निष्कर्षो का प्रकाशन पत्रिका ‘डिप्रेशन एंड एंजाइटी’ में किया गया है अमेरिका के पीट्सबर्ग विश्वविद्यालय के ब्रायन प्रिमैक ने कहा, “हमने पाया है कि सोशल मीडिया के सकारात्मक अनुभव, बहुत आंशिक रूप से कम अवसाद वाले लक्षणों से जुड़े हैं

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लेकिन निगेटिव अनुभव मजबूती से या लगातार उच्च अवसाद के लक्षणों से जुड़े हैं “इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने 1,179 पूर्णकालिक विद्यार्थियों के सोशल मीडिया के प्रयोग और अनुभव का सर्वेक्षण किया इनकी आयु 18 से 30 के बीच रही प्रतिभागियों ने अवसाद वाले लक्षणों के आकलन के लिए एक प्रश्नावली भी भरी

शोधकर्ताओं ने पाया कि सोशल मीडिया पर सकारात्मक अनुभव में हर 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी अवसाद के लक्षणों में चार प्रतिशत की कमी करती है, लेकिन ये परिणाम सांख्यिकीय रूप से जरूरीनहीं है, इसका अर्थ है कि यह निष्कर्ष बेतरतीब मौका की वजह से हो सकते हैं शोधकर्ताओं ने बोलाकि हर 10 प्रतिशत निगेटिव अनुभव में वृद्धि 20 प्रतिशत अवसाद लक्षणों में वृद्धि से जुड़ी हुई है, यह एक जरूरी सांख्यिकीय निष्कर्ष है

2017 में संसार के 18 राष्ट्रों में Social Media पर समय बिताने वाले लोगों पर एक सर्वे किया गया था इस सर्वे में 23 फीसदी लोगों ने माना था कि सोशल मीडिया की वजह से उनकी  उनके जीवनसाथी के बीच होने वाली वार्ता कम हो गई है, जबकि 33 फीसदी लोगों ने बोला कि Social Sites पर Active रहने के कारण वो अपने बच्चों से बहुत कम बात करते हैं  23 फीसदी लोगों का कहना है कि हमेशा Online रहने वाली आदत की वजह से वो अपने माता-पिता से कम वार्ता करते है 69 फीसदी युवाओं ने ये माना कि उनका अपने दोस्तों से संवाद कम हो गया है क्योंकि वो social media के ज़रिए उनका हालचाल पूछ लेते हैं

Facebook के एक पूर्व Vice President ने एक सेमिनार के दौरान ये बात कही थी कि सोशल मीडिया समाज को तोड़ने का कार्य कर रहा है  उन्हें इस बात का अफ़सोस है कि FaceBook को तैयार करने में उनकी भी किरदार थी 
हालांकि संसार के करोड़ों लोगों को  प्राश्यचित की ये बातें समझ में नहीं आ रही हैं