Wednesday , 20 June 2018
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सस्ती विमान सेवाओं के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा

केंद्र की नरेंद्र मोदी गवर्नमेंट कर्जों के बोझ तले दबी एयर इंडिया के निजीकरण की राह पर बढ़ रही है, लेकिन इस ‘बीमार महाराजा’ को खरीदने में देसी, विदेशी किसी भी एयरलाइंस ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है. एयर इंडिया के विनिवेश में विफलता मोदी गवर्नमेंट की मुश्किलें  बढ़ा सकती है.
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कई कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर अपना खजाना भरने की मोदी गवर्नमेंट की योजना को भी इससे झटका लग सकता है. गवर्नमेंट ने पहले एयर इंडिया में भाग नीलामी के लिए 14 मई तक बोलियां मंगाई थी. बाद में इसकी समयसीमा बढ़ाकर 31 मई कर दी थी. लेकिन गवर्नमेंट खरीदारों की राह तकती रही  एक भी दावेदार आगे नहीं आया.

नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 31 मई को ट्वीट किया, “वित्तीय सलाहकार ने सूचित किया है कि एयर इंडिया के रणनीतिक विनिवेश के लिए निकाले गए एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट के लिए कोई रिएक्शन नहीं मिली है. इस मामले में आगे की कार्रवाई उचित तरीके से तय की जाएगी.

गवर्नमेंट ने एयर इंडिया में 76 फीसदी भाग बेचने का प्रस्ताव किया है. प्रस्ताव के मुताबिक एयर इंडिया का प्रबंधन नियंत्रण भी व्यक्तिगत हाथों में दिया जाएगा. सौदे के तहत गवर्नमेंट एयर इंडिया के अतिरिक्त उसकी कम लागत वाली यूनिट एयर इंडिया एक्सप्रेस  एयर इंडिया एयरपोर्ट सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड को भी बेचने का इरादा रखती है.

ऐसा नहीं है कि एयर इंडिया के पास जो विमान हैं वो बेहद बेकार दशा में हों या फिर उनकी गुणवत्ता को लेकर भी कोई सवाल हों. ऊपर से ये भी हकीकत है कि हिंदुस्तान में सस्ती विमान सेवाओं के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा है  स्पाइसजेट, गो एयर, इंडिगो, एयर एशिया उड्डयन मार्केट के बड़े खिलाड़ी हैं.

हाल ही में आई एक रिपोर्ट में मुताबिक वर्ष 2026 तक हिंदुस्तान का उड्डयन मार्केट संसार का तीसरा सबसे बड़ा मार्केट बन जाएगा. हिंदुस्तान में अब भी एयर इंडिया का बोलबाला है  पिछले वर्षइसके विमानों में सफर करने वालों की तादाद करीब 30 करोड़ थी. तो फिर क्यों किसी एयरलाइंस की एयर इंडिया को खरीदने में दिलचस्पी नहीं है. तो उसकी कई वजहें हैं.

एयर इंडिया का संचालन

उड्डयन एरिया की सलाहकार संस्था सेंटर फ़ॉर एशिया पैसेफिक एविएशन यानी कापा के मुताबिक महाराजा पर मार्च 2017 तक तकरीबन 700 करोड़ डॉलर यानी 48000 करोड़ रुपये का कर्ज था गवर्नमेंट चाहती है कि जो भी इसे खरीदे 500 करोड़ डॉलर का कर्ज वो चुकाए.

कापा का ये भी अनुमान है कि एयर इंडिया को अगले दो वर्षों में 200 करोड़ डॉलर यानी साढ़े 13 हज़ार करोड़ रुपये का घाटा  हो सकता है. इसके अतिरिक्त एक्सप्रेशन ऑफ इंट्रेस्ट में खासतौर पर कर्ज  कर्मचारियों को लेकर दी गई शर्तें भी संभावित खरीदारों के गले नहीं उतर रही हैं.

उड्डयन एरिया के विशेषज्ञ हर्षवर्धन बीबीसी से कहते हैं, “भारी भरकम कर्ज तो है ही, वास्तविकचुनौती तो इसके ऑपरेशन यानी कामकाजी खर्च को कम करना है. अगर मौजूदा परिस्थितियों में किसी को एयर इंडिया का संचालन करना हो तो इसका ऑपरेशन खर्च कम करने में ही उसके पसीने छूट जाएंगे.

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हर्षवर्धन का कहना है कि अगले दो-तीन वर्ष में 25 से 30 हजार करोड़ रुपये उसे एयरलाइंस को ढर्रे पर लाने के लिए करने होंगे.

यूनियंस का डर

खरीदारों की महाराजा में दिलचस्पी न होने की एक  वजह हो सकती है  वो है 10 हजार से अधिक कर्मचारियों की यूनियन. इधर, गवर्नमेंट जिस तेजी से एयर इंडिया को बेचने की योजना बना रही थी, वहीं दूसरी ओर यूनियंस ने भी बढ़-चढ़कर इसका विरोध करना प्रारम्भ कर दिया था.

15 अप्रैल को निजीकरण के बाद बड़ी छंटनी की संभावना ज़ाहिर करते हुए एयर इंडिया की तकरीबन 11 यूनियंस ने विरोध के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया  ट्विटर, फेसबुक, यू-ट्यूब इंस्टाग्राम पर एयर इंडिया की बिक्री के विरूद्ध ग्राफिक्स  नारे लिखे.

‘सेव एयर इंडिया’ नारे के साथ सोशल मीडिया पर कर्मचारियों का ये विरोध बहुत ज्यादा चर्चा में रहा.

हर्षवर्धन कहते हैं, “कोई भी निवेशक इतना बड़ा निवेश करेगा तो कतई नहीं चाहेगा कि उसे यूनियंस के मोर्चे पर जूझना पड़े. हिंदुस्तान में इसके कई उदाहरण हैं कि भारी-भरकम पैसा लगाने के बाद निवेशक को उस सौदे से पीछे हटना पड़ा है.

सरकारी दखल की आशंका 

ऐसा नहीं है कि एयर इंडिया को खरीदने को लेकर किसी तरह की खबरें ही न आई हों. घरेलू एयरलाइंस जेट एयरवेज  इंडिगो ने शुरुआती दिलचस्पी दिखाई, लेकिन बाद में ये निष्क्रिय हो गए.

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इंडिगो ने ये कहते हुए सौदे के लिए आगे बढ़ने से मना कर दिया कि वो तो सिर्फ एयर इंडिया का विदेशी ऑपरेशन खरीदने का इच्छुक है- लेकिन गवर्नमेंट इसके लिए तैयार नहीं है. कतर एयरवेज ने भी शुरुआती संकेतों के बाद इस सौदे पर आगे न बढ़ने में ही अपनी भलाई समझी.

श्रीलंका का उदाहरण

हर्षवर्धन कहते हैं, “एयर इंडिया कोई दूसरी एयरलाइंस की तरह नहीं है. इसे राष्ट्रीय एयरलाइंस का दर्जा हासिल है. भले ही गवर्नमेंट इसका 76 प्रतिशत भाग बेचने जा रही हो, लेकिन इस बात की संभावना बनी हुई है कि इसमें गवर्नमेंट की दखलअंदाजी रहेगी ही.

“फिर इस बात का भी क्या भरोसा कि मोदी गवर्नमेंट के बाद केंद्र में अगर कोई दूसरी गवर्नमेंट आती है तो वो इसे मुद्दा नहीं बनाएगी.

हर्षवर्धन श्रीलंका में अमीरात एयरलाइंस का उदाहरण देते हैं. अमीरात एयरलाइंस ने 1998 में श्रीलंका एयरलाइंस में 43.6 फ़ीसदी भाग ख़रीदा था. इस सौदे के लिए एयरलाइंस ने करीब 7 करोड़ डॉलर खर्च किए थे.

अमीरात एयरलाइंस चाहती थी कि इसे मुनाफे में लाने के लिए प्रबंधन उसके हाथ में दिया जाए, लेकिन विदेशी निवेश को लेकर श्रीलंका के कानून  लोकल पॉलिटिक्स उसके आड़े आ गई अमीरात को मायूस होना पड़ा.

अब आगे क्या?

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एयर इंडिया को पटरी पर लाने की कोशिशें पहली भी हुई हैं, लेकिन कामयाबी नहीं मिल सकी. तो क्या मोदी गवर्नमेंट इस मोर्चे पर आगे बढ़ेगी  अगर हां तो अपनी रणनीति में क्या परिवर्तन लाएगी?

हर्षवर्धन कहते हैं, “मौजूदा गवर्नमेंट का कार्यकाल अब एक वर्ष ही बचा है, ऐसे में वो इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे बढ़ेगी, इसकी गुंजाइश कम ही है. लेकिन अगर गवर्नमेंट जिद पर ही अड़ी रही तो उसे विनिवेश की मौजूदा शर्तों में ढील देनी होगी. साथ ही ये भी भरोसा दिलाना होगा कि प्रबंधन के नियंत्रण में गवर्नमेंट की दखलअंदाजी नहीं रहेगी.

अभी के नियमों के मुताबिक किसी विदेशी कंपनी के लिए लोकल साझेदार का होना महत्वपूर्ण है.विदेशी कंपनी किसी भी इंडियन एयरलाइंस में 49 फीसदी से अधिक भाग नहीं खरीद सकती.

कोई बड़ी विदेशी कंपनी एयर इंडिया का नियंत्रण तभी अपने हाथ में ले सकती है, जब इस शर्त में परिवर्तन किया जाएगा. हालांकि कापा का मानना है कि एयर इंडिया का निजीकरण ही इसके बचे रहने की आखिरी उम्मीद है.

कापा ने हाल ही में जारी अपनी एक रिपोर्ट में बोला है, “अगर विनिवेश की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी नहीं की जाती तो एयरलाइंस (एयर इंडिया) बंद हो सकती है, बशर्ते की गवर्नमेंट करदाताओं की अरबों की कमाई एयरलाइंस को बचाने में न झोंक दे.

एयर इंडिया के पतन की कहानी

एयर इंडिया का पतन 2007 में भारतीय एयरलाइंस के साथ विलय के साथ प्रारम्भ हुआ. नौकरशाही के बेकार फैसलों  कर्ज में डूबे होने के बावजूद बोइंग विमानों के खरीदने के कारण इसकी बैलेंस शीट बिल्कुल चरमरा गई.

वर्ष 2018 में एयर इंडिया पर 52 हजार करोड़ रुपये का भारी कर्ज है जबकि घरेलू उड़ानों में इसकी हिस्सेदारी 2014 के 19 प्रतिशत से घट कर 13.3 प्रतिशत पर पहुंच गई है. सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने एयरलाइंस की परिसंपत्तियों  संचालन के विनिवेश की रूपरेखा तैयार की है.

एयरलाइंस के संचालन के अलावा इसकी तीन  सहायक कंपनियां हैं. एयर इंडिया इंजीनियरिंग सर्विस लिमिटेड, यह रखरखाव  मरम्मत का प्रबंध करती है.

एयर इंडिया ट्रांसपोर्ट सर्विस लिमिटेड, जो ग्राउंड हैंडलिंग करती है  एलायंस एयर जो छोटे शहरों के लिए उड़ानों का संचालन करती है.

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