Saturday , 26 May 2018
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चाय बेचने वाले इस शख्स को लोग बोलते है ‘रिक्शा वाला हीरो’

रायपुरः एक छोटे से रोजगार से लोग अपना जीवनयापन करने में असमर्थ होते हैं एक चाय बेचने वाले या फिर रिक्शा चलाने वाले लोगों का ज़िंदगी बेहद प्रयत्न से भरा होता है उन्हें दो वक्त की रोटी अपने  अपने परिवार वालों के लिए जुटाना सरल नहीं होता है प्रयत्न के साथ ज़िंदगी चालने के बाद भी ऐसे लोग जब किसी की मदद करते हैं तो यह सोचने वाली बात है लेकिन यह हकीकत है, छत्तीसगढ़ का का रहने वाला एक ऐसा चाय वाला जो अपनी कमाई से रिक्शा खरीद कर मरीज  वृद्धों की सेवा कर रहा है वैसे तो राष्ट्र में अलग-अलग कई चायवाले की कहानियां है लेकिन यह उनमें से एक ऐसा चाय वाला है जो चाय बेचकर रिक्शा वाला हीरो बन चुका है

छत्तीसगढ़ के डीडीनगर में एक छोटी सी चाय दुकान चलाने वाले 44 वर्ष के आनंद पांडे यहां लोगों के लिए वह चायवाला कहलाता है लेकिन कुछ लोग इन्हें ‘रिक्शा वाला हीरो’ के नाम से भी जानते हैं ऐसा हो भी क्यों नहीं जो गरीबों की मदद करता है  वृद्ध मरीजों का सहारा हो उसे हीरो तो कहेंगे ही

Image result for जानें, क्यों इस चायवाले को कहते हैं 'रिक्शा वाला हीरो'आनंद 15 वर्षों से बेच रहें है चाय
आनंद पांडे पिछले 15 वर्षों से चाय बेचने का कार्य कर रहे हैं उनके घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई का खर्च सभी इस व्यवसाय से ही चलता है प्रातः काल घर से बच्चों को बाय कहने के बाद आनंद अपना ई-रिक्शा लेकर निकल जाते हैं  रिक्शा चलाकर मुफ्त में गरीबों, वृद्धजनों  मरीजों को अस्पताल लाने ले जाने का कार्य करते हैं सबसे सोचने वाली बात यह है कि जहां लोग अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए अलग-अलग कार्य करते हैं वहीं, आनंद गरीबों  वृद्धों को अस्पताल पहुंचाने का कार्य मुफ्त में करते हैं वह कोई पैसे नही लेते हैं

अस्पताल में भी करते हैं मदद
चाय बेचने वाले आनंद पांडे केवल रिक्सा चलाकर ही लोगों की मदद नहीं करता बल्कि अस्पताल में मरीजों की मुफ्त सेवा भी करता है यहां विवेकानंद आश्रम के अस्पताल में आनंद फिजियोथैरेपी विभाग में मरीजों की मदद करता है वह इसके लिए रोज दो से तीन घंटे का समय देता है अस्पताल के चिकित्सक भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते हैं

आनंद क्यों करते हैं वृद्धों की मदद
इस बारे में आनंद का कहना है कि पहले वृद्धावस्था एक वरदान कहलाता था लेकिन अब यह अवस्था अभिशाप बन चुका है लोग वृद्ध होने के बाद तकलीफ पाते हैं इसलिए वह ऐसे लोगों की सेवा कर रहे हैं, ताकि उन्हें यह अवस्था अभिशाप नहीं लगे आनंद का कहना है कि हर किसी को एक न एक दिन वृद्धावस्था में आना है बच्चों को यह बताना होगा कि इस अवस्था में आन के बाद माता-पिता की सेवा क्यों महत्वपूर्ण हो जाती है

ऐसे प्रारम्भ हुआ मदद करने का जुनून
आनंद का कहना है कि उन्होंने अपनी मां की तकलीफ को देखा था तब से ही उन्हें सेवा का जुनून सवार है उन्हें पता है कि गरीब  वृद्ध जिन्हें रोज अस्पताल जाना हो वह रिक्शा या टैक्सी नहीं कर सकते उन्हें अधिक तकलीफ उठानी पड़ती है इसलिए वह ऐसे लोगों की मदद करते हैं

आनंद को नहीं है भविष्य की चिंता
आनंद का कहना है कि वो भविष्य की चिंता नहीं करते, उन्हें वर्तमान में दूसरों को हो रही तकलीफ पहले दिखती है दिनभर मुफ्त में रिक्शा चलाने के बाद आनंद पांडे अपनी चाय की दुकान लौट आते हैं चाय की दुकान उनके नौकर चलाते हैं हालांकि चाय दुकान के मालिक खुद आनंद पांडे ही है भी वही हैं आनंद खुद यहां पांच से छह घंटों की मेहनत करते हैं

पत्नी भी है आनंद के कार्य से खुश
आनंद की पत्नी रानु पांडे पहले उनके इस कार्य से नाराज होती थी वह बोला करती थी कि घर के सारे पैसे बाहर वालों पर खर्च करोगे तो बच्चों का क्या होगा बच्चे अपनी पढ़ाई कैसे करेंगे लेकिन अब उनकी पत्नी इस कार्य से खुश हैं क्योंकि वो चाय की दुकान से घर चलाने लायक पैसे ले आते हैं बाकी सेवा में खर्च कर देते हैं